इन्टरनेट के चलते परिवार के प्यार से दूर हो रहे बच्चे

अब से बीस पूर्व बच्चे खेल के मैदानों में घंटों अपने दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा, कंचा, कबड्डी, छुपन-छिपाई, पि_ू, चोर-सिपाही, सांप-सीढ़ी और न जाने वे कितने खेल जो आज सिर्फ किताबों में ही पढऩे या तस्वीरों देखने को मिलेगें। इन खेलों में इतने मस्त रहते थे कि खाने-पीने तक की फु रसत नहीं रहती थी, पर अब ऐसा नहीं है। आज के दौर में मोबाइल, इंटरनैट, लैपटॉप व कंप्यूटर में सिमट कर रह गए हैं। उन की दुनिया अब एक कमरे में सिमट गई है। वे अकेलेपन का शिकार हो चले हैं। इससे बच्चे अपनी बात किसी से कुछ कह भी नही पाते है
इक्कीसवीं सदीं में हाईजैनिक फूड खाने से बच्चों के शरीर में शारीरिक गतिविधियों के नाम पर कुछ भी नहीं हो रहा। बर्गर, पिज्जा, चाऊमीन, चीज, बटर व सौस के बिना दालरोटी, चावल व फ लसब्जी के अलावा कुछ भी पसन्द नहीं। ऐसे में मानसिक के साथ-साथ शारीरिक बीमारियों से भी वे ग्रसित हो रहे हैं। बच्चों में अधिकांशत: देखा भी गया है कि मोबाइल या इंटरनैट में सामान्य गेम को कोई हाथ तक नहीं लगाता। अब हिंसक गेम को ज्यादातर तवज्जों दे रहे हैं। इस गेम को खेलने के लिए उन्हें अकेलापन चाहिए, इसलिए वे अपनेआप को कमरे बंद कर लेते हैं या फि र छत या दूसरी जगह कहीं जा कर इस गेम को खेलते हैं। यही वजह है कि हर रोज नए नए गेम बनाए जा रहे है। इस से बच्चों में दिनों-दिन हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है।आए दिन पत्र-पत्रिकाओं में पढऩे को मिल जाता है कि घंटों बैठ कर गेम खेलना बच्चों की मृत्यु का कारण बना।
  • थ्री-डी गेम और फोर जी स्पीड तक सिमटी बच्चों की दुनियां
  • पारम्परिक खेलों से होता था सेहत में सुधार
हिंसक गेम खेलने वाले बच्चे अब हिंसक तसवीरों को देख कर विचलित नहीं होते बल्कि उन्हें मजा आता है, इसलिए बच्चे अब अपना धैर्य खोते जा रहे हैं। अपनी बात को मनवाने के लिए वे मातापिता से पहले जिद करते हैं और जब मातापिता उन की बात को नहीं मानते हैं तो वे हिंसक प्रवृत्ति को अपनाने में पीछे नहीं रहते. ऊंची आवाज में बोलना और धमकी देना तो आम बात हो गई है। धीरे-धीरे यही रवैया उन के लिए घातक साबित होता है।
एक ऐसा गेम जिसका दुनिया में रही चर्चा , हाल ही में खूब चर्चित ब्लू व्हेल नामक गेम के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा।
हिंसक गेम, हिंसक कार्टून या फि र हिंसक फि ल्म बच्चों की मानसिकता पर असर डाल रहा है। टैलीविजन में भी कार्टून फिल्मों में इस तरह के कैरेक्टर को परोसा जाता है जो बच्चों के दिमाग पर असर डालता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चिंता जाहिर की है कि ज्यादातर मारधाड़ वाले टीवी चौनल व वीडियो गेम खेलने वालों का ब्लडप्रैशर बढ़ा हुआ पाया गया है और यह चिंता का विषय है। ब्लू व्हेल गेम भी ऐसा ही गेम है जो बच्चों को निगल रहा है। विदेशों से ले कर भारत में भी बच्चे इस के शिकार हो चुके हैं। इस गेम में एक लक्ष्य पूरा करना होता है। कई बच्चे इस लक्ष्य को पूरा करने के एवज में अपनी जान गंवा चुके हैं।
बाजार में भी आजकल बच्चों के खिलौनों के रूप में बंदूक, पिस्तौल, तलवार व छुरा जैसे खिलौने बिक रहे हैं. बाजार में चलते वक्त बच्चे अपने माता-पिता को उंगली पकड़ कर वहीं खींच लेते हैं। बच्चे की जिद की वजह से मातापिता भी उसे वही खरीद कर देते हैं जो उस ने डिमांड की।
माता-पिता भी इस के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। बच्चे को मोबाइल दे देना या बच्चों के उछलकूद या शोर मचाने से पीछा छुड़ाने के लिए टीवी में कार्टून नैटवर्क लगा कर बिठा देना कहां की समझदारी है? धीरेधीरे बच्चे बिना कार्टून नैटवर्क या मोबाइल के खाना नहीं खाते। कई माता-पिता बच्चों को खिलाते वक्त या तो मोबाइल पकड़ा देते हैं या फि र टेलीविजन में कार्टून नैटवर्क लगा कर खिलाते हैं। बच्चे तो बच्चे हैं, पर कम से कम आप तो बच्चे मत बनिए।
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