सूचना न देने वाले अधिकारी क्यों न हों दण्डित

12 अक्टूबर 2005 को सूचना अधिकार अधिनियम लागू हुआ था। इसकी अधिनियम की 13वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री से इस अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए मांग की गई।
यह पत्र आगरा डवलपमेन्ट फाउण्डेशन (एडीएफ) के सचिव के0सी0 जैन द्वारा मुख्यमंत्री को भेजा गया, जिसमें कहा कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के उद्देश्य से शासकीय कार्यों में पारदर्शिता एवं निष्पक्षता लाने के उद्देश्य से सूचना अधिकार अधिनियम मील का पत्थर है और प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार को समूल समाप्त करने के लिए संकल्पित है लेकिन उक्त अधिनियम की कार्यान्वयन की वर्तमान स्थिति प्रदेश में संतोषजनक नहीं है। पत्र में निम्न सुझाव दिये गयेः-
 
1. अधिनियम की धारा-4 के अंतर्गत यह प्रत्येक पब्लिक अथॉरिटी की जिम्मेदारी है कि वे अपनी वेबसाइट बनाये, जिस पर समय-समय पर सूचनायें दें किन्तु अनेक विभागों द्वारा अपनी वेबसाइट बनाई तक नहीं गई हैं। 
-हमारा सुझाव है कि सभी विभागों को अपनी वेबसाइट बनानी चाहिए।
 
2. यदि वेबसाइट बनाई भी गई हैं तो उसमें दी गई सूचनायें नाममात्र की हैं और सूचनाओं को अपडेट नहीं किया जाता है और नई सूचनायें भी अपलोड नहीं की जाती हैं। 
-हमारा सुझाव है कि सूचनाओं को अपडेट करने का है।
 
3. आवेदकों को जो सूचनायें उपलब्ध कराई जाती हैं वे अक्सर आधी-अधूरी होती हैं क्योंकि 13 वर्ष के उपरान्त भी सूचना न देने की मानसिकता बनी हुई है। 
-हमारा सुझाव है कि अफसरतन्त्र को यह संदेश देने का है कि वे सूचनायें नियमानुसार सबको उपलब्ध करायें और जो उपलब्ध नहीं कराते हैं उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही हो।
 
4. प्रथम अपील विभागीय अधिकारियों द्वारा निर्णीत की जानी चाहिए जिनके द्वारा निर्णय में देरी की जाती है जिसके कारण प्रथम अपील का प्राविधान उपयोगी नहीं हो रहा है। -अतः यह जरूरी है कि प्रथम अपीलीय प्राधिकारी अपीलों का निस्तारण समय से व सही तरह से करें।
 
5. धारा-6 के अनुसार इलैक्ट्रॉनिक साधन के माध्यम से भी सूचना प्रार्थना-पत्र लगना चाहिए, जिसके सम्बन्ध में केन्द्र सरकार द्वारा ऑनलाइन प्रार्थना-पत्र व अपील किये जाने का प्राविधान है किन्तु राज्य सरकार द्वारा अभी पहल नहीं की गई है, जिसके सम्बन्ध में पूर्व में भी ध्यान आकर्षित किया गया था।
-केन्द्र सरकार की तर्ज पर ऑनलाइन प्रार्थना-पत्र लगाने की सुविधा यथाशीघ्र प्रारंभ की जाये।
 
6. प्रदेश के सूचना आयोग को और अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए जहां हजारों की संख्या में शिकायतें व द्वितीय अपीलें लम्बित हैं, जिनके निपटारे में सालों लग जायेंगे, ऐसी देरी के कारण सूचना प्राप्त करने का उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
 
7. सभी विभागों द्वारा अपनी वार्षिक रिपोर्ट सरकार को भेजनी होती है किन्तु विभागों द्वारा प्रायः नहीं भेजी जा रही हैं।
-वार्षिक रिपोर्ट को विभागों द्वारा सरकार को धारा 25(2) के अंतर्गत भेजा जाये, यह हमारा सुझाव है।
 
8. राज्य सूचना आयोग की वार्षिक रिपोर्ट भी विधान सभा व विधान परिषद् में नहीं रखी जा रही है, जो कि अधिनियम की धारा 25(4) के अंतर्गत आवश्यक है, जिसका अनुपालन सुनिश्चित होना चाहिए।
 
9. इस अधिनियम के कार्यान्वयन के सम्बन्ध में जिलाधिकारी, मण्डलायुक्त व मुख्य सचिव द्वारा भी अपनी मासिक बैठकों में मॉनिटरिंग की जाये ताकि भ्रष्टाचार को समाप्त किये जाने की दिशा में यह अधिनियम कारगर सिद्ध हो सके।
पत्र में यह भी आशा व्यक्त की गई कि सूचना अधिकार अधिनियम को अच्छी तरह लागू करने पर भ्रष्टाचार पर रोक लग सकेगी और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता व खुलापन पूरी तरह से आ सकेगा।
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