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क्या होता है वैलेंटाइन डे और क्या है इसकी अवधारणा ?

आज वेलेन्टाइन डे है यानि प्रेम का प्रतीक दिन या प्रेम दिवस।इसको लेकर सबकी धारणा अलग अलग है।कुछ लोग इस दिन के विरोधी है तो कुछ लोग इसके साथ।मेरा मानना है कोई चीज न अच्छी है न बुरी ।सब कुछ डिपेंड करता है।हम जिसे बहुत मानते है या चाहते वे हमारे माता पिता हो या कोई दोस्त या कोई प्यारा रिश्ता ।इस दिन प्रेम को जता सकते है उसका सम्मान कर सकते है तो यही दिन और यही प्रेम उच्चता को प्राप्त कर लेत है।लेकिन इस दिन को हमने किसी के ह्रदय को ठेस पहुँचायी या इस दिन के आड़ के किसी को भ्रमित किया तो ये नीचता की स्थिति में चली जायेगी।हम अक्सर बात करते है प्रथाओं को हटाने की या किसी और के न अपनाने की।मगर सत्य ये है कि हमें कुप्रथाओं को हटाना है न कि …..
सबसे पहले ये समझ ले कि शुद्ध और सच्चा प्रेम माँ पिता के प्रेम की तरह ही होता है जहाँ न अविश्वास है,न धोखा है न भय है।अगर है तो हर परिस्थियों में साथ रहने का विश्वास और निराशा में भी आशा।एक सच्चा प्रेम प्रश्न नहीं करता ,शर्त नहीं रखता।प्रेम तो प्रेम है जो उन्मुक्त है ,आनन्द है।हर एक वो मुस्कान जो आप किसी के होंठों पर सजा सके जो आपके करीब है वास्तव में वही खूबसूरत प्यार है।जैसे राधा को कृष्ण पे इतना विश्वास है कि पूरी जिंदगी उन्हें समर्पित है ।सीता को अपने सिर्फ राम से आस है ।हर एक वो त्योहार या दिन जो किसी के अंदर अच्छी भावनाओ को जगा दे,मुस्कुराहट बिखेर दे वो वास्तव में मनाने योग्य है।कोई प्रथा या त्योहार या दिन बुरे नहीं होते ।अगर अच्छे और बुरे होते है तो वो है इंसान।सब उसके ऊपर ही डिपेंड करता है।
अगर आप वास्तव में स्वयं के प्रति सच्चे है,शुद्ध प्रेम और शुद्ध भाव रखते है फिर भी आपके कोई भी रिश्ते आप को समझते नहीं तो स्वयं पर ये भी विश्वास रखे कि आप वो हीरा है जिसे पहचानने वाला अभी कोई जौहरी नहीं मिला।
विवेकानंद जी के अनुसार-प्रेम का न कोई उद्देश्य होता है न स्वार्थ होता है।यह मनोमस्तिष्क को हल्का रखता है और आनंद सिर्फ आनंद देता है।

वंदना चौबे की फेसबुक पोस्ट से

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