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देश में बढ़ती आर्थिक असमानता का समाधान ज़रूरी 

लेखक-  सतीश वर्मा
भारत आज दुनियाँ मे सबसे तेज़ी से बढ़ती  अर्थव्यवस्थाओं मे से एक है लेकिन आर्थिक विकाश की उच्चदर बढ़ती असमानता से जुड़ी हुई है जिसमें आर्थिक सामाजिक एवम् क्षेत्रीय और ग्रामीण शहरी असमानता शामिल है हमारे देश मे बड़ती असमानता चिन्ता जनक है क्योकि र्थिक सामाजिक और राजनैतिक असमानताओ का प्रभाव हमारे तेज समग्र और तेज विकाश को छति पहुँचाता है  वक़्त ऐसा आता है जब हम दुनियाँ भर मे आर्थिक असमानता को लेकर भावुक होते है जबकि हमारे ही देश मे अमीरों और ग़रीबों के बीच मे चौड़ी होती खाई की ख़बर अब बासी हो चुकी है| असमानता से अधिक चिन्ता की बात यह है कि दोनों पक्षों का प्रतिनिधित्व करने बाले विशेषज्ञ लोगों के बीच बोलते है कि संपत्ति विवरण मे यह दीर्घाकालिक प्रभाव है जो “ अमीर को और ज़्यादा अमीर और ग़रीब को और ज़्यादा ग़रीब  “ बना रहा है
हाल ही मे किये गये ओक्सफेम के सर्वे के अनुसार हमारे देश मे 10 फ़ीसदी सर्वाधिक धनी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का क़रीब 80.7 फ़ीसदी है| जबकि 90फीसदी आवादी के पास केवल 19.3 फ़ीसदी संपत्ति है  वही भारत के एक फ़ीसदी लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 51.53 फ़ीसदी हिस्सा है वही 60 फ़ीसदी आबादी के पास 4.8 फ़ीसदी संपत्ति है|
देश के शीर्ष 9 अमीरों की संपत्ति 50 फ़ीसदी ग़रीब आबादी की संपत्ति के बराबर है | हमारी सरकारें स्वास्थय सेवा और शिक्षा जैसी सार्वजनिक सेवाओं का कम वित्त पोषण असमानता को और बडावा दे रही है 
और वही दूसरी ओर कम्पनियाँ और अमीरों पर कम कर लगा रही है और कर चोरी रोकने  मे भी नाकाम रही है 
आर्थिक असमानता से सबसे ज़्यादा ग़रीब और महिलायें प्रभावित हो रही है रिपोर्ट के मुताबिक। देश के सबसे अमीर 
मुकेश अम्बानी की कुल संपत्ति 2.8 लाख करोड़ है वही हमारे देश मे ग़रीब दो वक़्त की रोटी और बच्चों की दवाओं के
लिये जूझ रहै है वही अमीरों की संपत्ति लगातार बड़ती जा रही है हमारे देश मे ग़रीब ओर अमीर के बीच मे बहुत बड़ी खाई है| और ये खाई लगातार बड़ती जा रही है कुछ दिनो पहले इन्टरनेशनल राइट्स गुरूप आँक्सफेम ने एक सर्वे किय जिसमें बताया गया कि 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति मे महज़ एक फ़ीसदी संपत्ति का इज़ाफ़ा हुआ है यानी देश की आधी से ज़्यादा आबादी की संपत्ति महज़ एक फ़ीसदी बड़ी और एक फ़ीसदी आबादी ने लगभग 73 फ़ीसदी लोगों ने क़ब्ज़ा किया इसी तरह ग़रीबों और अमीरों मे यह अतंर लगातार बड़ता जा रहा है  हमारे देश मे छमता है कि नागरिकों को एक अधिकार युक्त जीवन देने के साथ समाज मे व्याप्त असमानता को दूर करे हमारी सरकारों को शिक्षा एवम् स्वास्थ्य के क्षेत्र मे सुधार लाना होगा ग़रीबों के समर्थक बने रहने की सरकारी नीति ने मानवपूँजी के विश्वास को फेंकने से रोका है अत: बड़ती असमानता को दूर करने के लिये सरकार को नीति परिवर्तन करने होगे जन नीति को इस पृकार से गड़ा जाना चाहिये कि सरकार समाज हित को ध्यान मे रखते हुऐ निजी उधंम को अधिक से अधिक बडावा देने की ज़रूरत है पढ़े लिखे बेरोज़गारों को उनकी इच्छा के अनुसार रोज़गार दिये जाये
हमारा देश एक कल्याणकारी देश है हम अति ग़रीब या असमानता को अनुमति नही दे सक्ते विभिन्न सरकारों के कार्यकालो मे शुरू की गयी योजनाओं जैसे-
  •  शिक्षा का अधिकार
  •  सूचना का अधिकार
  •  प्रधानमंत्री मुद्रा योजना

आदि योजनाओं के अधिकारो को प्रभावी  रूप से उपयोग करने से आर्थिक असमानता पर लगाम लगेगी|

आर्थिक असमानता अपरिहार्य नही है और अर्थ शास्त्र मे ऐसा कोई नियम नही बैंडों कहे कि अमीर को और ज़्यादा अमीर होना चाहिये वह भी तब जब ग़रीब दवा के अभाव मे एवम् भूख से मर रहा हो  इस स्थिति मे इतने कम लोगों  के हाथ मे इतनी अधिक संपत्ति का कोई औचत्य नही है |
आर्थिक असमानता को दूर करने के लिये अब हमें गंभीर होने की आवश्यकता है|  दुनिया के  के सर्वाधिक अमीर लोगों द्वारा अर्जित अधिकाँस संपत्ति कर बचत करने वाली व्यवस्था के ज़रिये इकट्ठा हो गयी है अगर इस धन पर उचित ढंग से कर लगे तो दुनिया की सरकारों की प्रतिवर्ष 190 अरब डाँलर की कमाई हो सकती है|
सरकारें धन कुबेरो को पक्ष में ही खड़ी नज़र आती है  एक तरफ़ जब दुनिया में मानवाधिकार और जन कल्याण को लेकर तरह तरह की पहल हो रही है ऐसे वक़्त में ग़रीबों की ऐसी  स्थिति होना ग़रीबी निवारण के पृयासो पर प्रश्नचिन्ह लगाती है धन को लेकर समय के साथ हमारी अवधारणा बदल गयी है और इसे ज़रूरत के बजाय महत्वाकांक्षा की वस्तु बना दिया गया है यही कारण है कि दुनिया के सर्वाधिक अमीर लोगों के पास इतना धन है वह भी और धन जुटाने का प्रयास या दुष्पृयास करने से नहीं चूकते अमीरों को धन की लालसा के चलते देश के अनगिनत ग़रीब  “नरकीय “जीवन जीने के लिये विवस है|
यह बात सही है कि आज ग़रीब चुप है और स्थित को सहन कर रहै है लेकिन ऐसा समय दूर नहीं है जब उनकी सहन शक्ति ख़त्म हो जायेगी और सायद उनके पाल अपने अधिकार के आर्थिक संसथानो को पाने के लिये महज़ संघर्ष का रास्ता बचेगा समय रहते हमें इस खांई को पाटने के लिये क़दम उठाने होगे अन्यथा यह भविष्य के लिये एक बड़ा संकट शाबित हो सक्ता है सरकारों को इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है|

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