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क्या बहुजन समाज पार्टी अपना जनाधार समटने का प्रयास कर रही है?

जब बहुजन समाज पार्टी का गठन हुआ था तो बहुजन समाज के अंदर एक चेतना जागी थी कि शायद अब हमारा उद्दार होगा. , हम अपनी बात सीना तान के कह सकेंगे| जब बसपा सत्ता में थी तो दलितों का विकास बेशक उतना न हुआ हो जितना होना चाहिए था लेकिन स्वाभिमान का स्तर काफी बढ़ गया था और समाज , सरकार, क़ानून के प्रति जागरूकता भी बढ़ी थी| 2012 से लगातार अपेक्षा के अनुसार परिणाम न पाकर ही शायद बसपा प्रमुख ने पार्टी को ख़त्म करने का विचार बना लिया होगा? तभी तो सभी बड़े नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया।
अगर मायावती पार्टी का ग्राफ बढ़ाना चाहती तो कुछ नया करतीं लेकिन वो नहीं हो रहा है आइये देखते हैं अन्य राजनेताओं के परिवार के लोग कहाँ से कहां पहुंचे राजनीति में और मायावती का भतीजा कहाँ है-
भारतीय राजनीति में युवाओं का वर्तमान और भविष्य बहुत महत्वपूर्ण नजर आ रहा है। वर्तमान में राहुल गाँधी को छोड़ दिया जाये तो अन्य युवा नेता इतने पिछड़ते नजर नहीं आ रहे। भारतीय राजनीति में सच है कि अधिकतर प्रमुख पार्टियों के मुखियाओं ने अपनी राजनीतिक विरासत अपनी संतानों या अपने परिवारीजनों को ही सौंपी है।
राहुल गांधी – राहुल गाँधी विदेश में पढ़े और देश में आते ही उनको पार्टी में बड़ा पद और सांसदी के लिए परम्परागत सीट मिल गयी। बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये। लेकिन युवा अभी तक उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे। राहुल गाँधी भाषण कला में भी अभी तक पिछड़ते ही दिखे हैं।
अखिलेश यादव – अखिलेश यादव की बात करें तो वो भी विदेश में पढ़कर राजनीति में आये लेकिन वो हमेशा देश की माटी और भेषवूशा से जुड़े रहे और राजनीति मे प्रवेश के लिए भी जमीनी राजनीति का रास्ता चुना 2012 के उ प्र विधानसभा चुनाव के ठीक दो साल पहले निकल पड़े साईकिल लेकर और कूद पड़े चुनावी दंगल में। उसका फल 2012 मे देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री के रुप में उभरे। बाद में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने।
तेजस्वी यादव – तेजस्वी यादव भी अपने पिता लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद राजनीतिक विरासत अपने हाथ में लेकर कूद गये जमीनी राजनीति में और चुनावी दंगल के वह मोहरा बनकर उभरे और सीधे उप मुख्यमंत्री बने।
दुष्यंत चौटाला – हरियाणा मे अपने पिता के जेल में होने के कारण उनकी जमीनी राजनीति की कमान सभाली खुद दुष्यंत चौटाला ने। वह दुष्यंत चौटाला जिसे हराने के लिए भाजपा ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया और मायावती जी ने उसकी पार्टी से गठबंधन को ठुकरा दिया। लेकिन फिर भी चुनावी दंगल में कूदा और 90 में से 10 सीटें लेने में कामयाब हुआ। समीकरण ऐसा बना कि भाजपा उसी दुष्यंत चौटाला के बिना सरकार नहीं बना सकी और उसे उपमुख्यमंत्री बनाना पड़ा |
आदित्य ठाकरे – शिवसेना के युवराज आदित्य ठाकरे जिसे कुछ समय पहले ही शिवसेना के यूथ फ्रंट का नेतृत्व मिला और कूद गया चुनावी दंगल में जमीनी राजनीति के लिए और आलम ये हुआ कि भाजपा जिसका शिवसेना सहयोगी दल है उसके बिना सरकार बनाते नहीं दिख रहा और शिवसेना है कि आदित्य ठाकरे को मूख्यमंत्री बनाने की शर्त पर अड़ी हुई है! आदित्य ठाकरे उपमुख्यमंत्री पद पर समझौता करने को तैयार नहीं।
आकाश आनंद – अब बात करते हैं एक ऐसे युवा की जो भविष्य का नेता बन सकता है जिसे कुछ समय पहले ही उसकी बुआ, बसपा पार्टी की सुप्रीमों बहिन मायावती जी ने पार्टी का राष्ट्रीय कॉर्डिनेटर बनाया था। जी हां हम बात कर रहे हैं आकाश आनंद की। वही आकाश आनंद जो 2019 के लोकसभा चुनावों में बसपा की लगभग हर चुनावी रैली में बुआ और अन्य नेताओं के साथ मंच पर दिखते थे! ये भी विदेश से पढ़कर लौटे हैं लेकिन मंच पर जाने के तौर तरीके नहीं सीख पाये हैं। ये जनाब अभी तक मंच पर किसी बुजुर्ग नेता के पैर तक छूना नहीं सीखे हैं और तो और कम से कम दो लाख के गुच्ची के जूते पहनकर मंच पर विराजमान होते हैं। मंच से बोलना अभी तक नहीं सीखे हैं! इनकी अब तक की शैली लगभग राहुल गाँधी जैसी ही रही है! यही कारण है कि अभी दलित युवा ही इसे अपना नेता स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं!

अगर बहिन जी वाकई आकाश को भविष्य का नेता बनाना चाहती हैं और भविष्य में अन्य नेताओं की तरह पार्टी की कमान सौंपना चाहती हैं तो फिर आकाश को हर हाल में मंच छोड़कर जमीनी राजनीति करनी होगी! बहिन जी को चाहिए की आगामी 2022 के उ प्र विधानसभा को देखते हुए आकाश को एक यूथ फ्रंट के माधयम से युवाओं को जोड़ने और युवा नेतृत्व के लिए छोड़ देना चाहिए! इस एक तीर से बहिन जी दो निशाने साध सकती हैं! एक तो वह बसपा से नाउम्मीद होकर तमाम संगठने में खिसक रहे युवाओं को पार्टी से पुनः जोड़ने और युवा कार्यकर्ताओं की फौज तैयार में कामयाब हो सकती हैं! दूसरा आकाश को भी संगठनात्मक राजनीति सीखने का मौका मिलेगा और उसमें नेतृत्व क्षमता बढ़ेगी! वैसे भी आकाश को युवा ही अपना नेता मान सकते हैं पार्टी के वह कार्यकर्ता नहीं जो पार्टी के लिए 25-30 साल खपा चुके हैं! जितनी कि अभी आकाश आनंद की उम्र भी नहीं हुई|
अगर अब भी बहिन जी किसी यूथ फ्रंट बनाने पर विचार नहीं करती हैं और युवाओं को नहीं जोड़ती हैं तो दलित युवा किसी चंद्रशेखर रावण जैसे युवा को ही अपना नेता मान सकता है आकाश आनंद को नहीं! क्योंकि आज का युवा अपने नेता से जमीनी राजनीतिक संघर्ष करवाना चाहता है जो कभी स्वयं बहिन जी ने किया था और 4-4 बार देश के सबसे बड़े सूबे उ प्र की मुख्यमंत्री बनीं|

अब बहिन जी ने पार्टी से नेताओं को बाहर निकालने की लाइन लगा दी है| आगरा जो दलितों कि राजधानी कहा जाता है वहां से भी बसपा प्रमुख ने वरिष्ठ  नेताओं को पार्टी से निकाल दिया है |

डॉ नरेन्द्र वरुण
9897906876
सामाजिक एवं राजनैतिक विचारक!

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