November 26, 2020
आगरा

जै-जै पुलिस देवा, बोलो जै-जै पुलिस देवा

हर थाने के मुंशियाने में टंगे कैलेंडर से पुलिस की आरती हमने तो कर ली, आपने की या नहीं?

ठाईगीरों, गुंडों और बदमाशों के लिए पुलिस काल के समान है?  बेचारे पुलिस वालों को आधा पेट ही भोजन मिल पाता है? उनको पेट भर खाना कभी नहीं मिल पाता ? पुलिस के बिना नेता या अभिनेता तो छोड़िए प्रधानमंत्री तक अपंग हो जाते हैं?  ऐसा हम नहीं कह रहे। प्रत्येक पुलिस थाना में टंगी पुलिस की आरती का केलेंडर कह रहा है, जिसे देखकर व पढ़कर पुलिसकर्मी खुद पर शरमाए बिना नहीं रह पाते हैं। क्या पुलिस मेनुअल में इस प्रकार के प्रशंसापत्र का सार्वजनिक रूप से थाने की दीवार पर टांगे जाने का प्रावधान है ?

मार्च 2018 में आगरा में अमित पाठक एसएसपी के रूप में तैनात थे। आचार्य विष्णुदास नामक किसी व्यक्ति ने उन्हें एक पुलिस आरती का केलैंडर भेंत किया। इस केलेंडर की प्रतियां विभिन्न थानों में तत्कालीन एसएसपी द्वारा भेजि गईं। साथ ही निर्देशित भी किया गया कि सभी थाना इंचार्ज थाना में इस केलेंडर को टांगें। 2018 में भेजा गया यह केलेंडर आज भी शहर के थानों में मुंशियाने (आफिस) की दीवार पर टंगा हुआ है। इस आरती में पुलिस तथा पुलिसकर्मियों को देवता की संज्ञा दी गई है। आरती में ऐसे-ऐसे विशेषण का प्रयोग किया गया है कि जिसे पढ़कर खुद थाने के स्टाफ को पता चलता है कि उनके व्यक्तित्व में कैसे-कैसे मानवीय और दैवीय गुणों का समावेश है। कुछ पुलिसकर्मी तो इस आरती को पढ़कर खुद ही शरमा कर इधर-उधर देखने लगते हैं कि कहीं उन्हें कोई इस आरती को पढ़ते देख तो नहीं रहा। ‘जै-जै पुलिस देवा, बोलो जै जै पुलिस देवा’ की पहली लाइन से शुरू हुई इस आरती की 14वीं लाइन को पढ़कर कोई भी मुस्कराए बिना नहीं रह सकता। इस लाइन में कहा गया है कि भुखे पेट रहकर ही पुलिसकर्मी सारा काम करते हैं तथा उन्हें कभी भरपेट भोजन नहीं मिल पाता। आरती की अंतिम लाइन में तो पुलिस को इस युग की सच्चाई बताते हुए इस युग के साँई की संज्ञा दी गई है। 

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