February 28, 2021
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एक राजस्व निरीक्षक ने फैलाया है रायता!

  • जॉन्स मिल संपत्ति विवाद
  • एत्मादपुर में तैनात राजस्व निरीक्षक ने जांच अधिकारियों के समक्ष गलत तथ्य रखे
  • मुख्यमंत्री पोर्टल पर की गई शिकायत, बगैर बैनामा कब्जाधारियों पर नरमी क्यों है?

जॉन्स मिल संपत्ति मामले की जांच को जुलाई माह में जिलाधिकारी के आदेश पर अपर जिलाधिकारी प्रशासन निधि श्रीवास्तव की अध्यक्षता में बनी समिति के सदस्य एत्मादपुर के राजस्व निरीक्षक ललित नारायण प्रशांत (ललित कुमार) आरोपों के घेरे में आ गए हैं। उन पर जॉन्स मिल संघर्ष समिति के सदस्यों ने कागजात देने के नाम पर मोटी राशि मांगने के आरोप लगाए हैं। इसकी शिकायत संघर्ष समिति के सदस्यों ने मुख्यमंत्री के शिकायत पोर्टल पर भेजी दी है। साथ ही संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि वह जिला प्रशासन को कानून पर विश्वास रखते हुए न्यायालय की शरण में जाने के आदेश दें। सीएम को भेजे पत्र में उल्लेख किया गया है कि जॉन्स मिल परिसर की गरीब बस्ती में वर्षों से हजारों लोग बिना बैनामा कराए भूमि पर कब्जा किए बैठे हैं। प्रशासन को पहले उनसे जमीन खाली कराने की कार्रवाई करनी चाहिए।

गौरतलब है कि जिलाधिकारी के निर्देश पर एडीएम प्रशासन निधि श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली जांच समिति ने 15 दिसंबर 2020 को जांच रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंप दी थी। इस समिति में एडीएम प्रशासन निधि श्रीवास्तव के अलावा एसडीएम सदर एम अरुणोमौली, एसीएम प्रथम विनोद जोशी, तहसीलदार सदर प्रेमपाल सिंह, सब रजिस्ट्रार (निबंधन) पंचम अशोक कुमार, एत्मादपुर में तैनात राजस्व निरीक्षक ललित नारायण प्रशांत और नरेंद्र कुमार शामिल थे। इनकी जांच रिपोर्ट आते ही जॉन्स मिल क्षेत्र के बाशिंदों में खलबली मच गई थी। जिलाधिकारी ने जांच रिपोर्ट आने के बाद यहां के 139 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें भूमाफिया घोषित करने की प्रक्रिया प्रारंभ करने के मौखिक आदेश जारी कर दिए। लोगों को पानी, बिजली के नये कनेक्शन देने पर रोक लगाने के साथ ही जमीन के हस्तांतरण, बैनामे, मानचित्र स्वीकृति पर भी रोक लगा दी थी।

निशाने पर राजस्व निरीक्षक
संघर्ष समिति की ओर से मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में स्पष्ट लिखा है कि जिलाधिकारी के निर्देश अपर जिलाधिकारी प्रशासन निधि श्रीवास्तव द्वारा जॉन्स मिल की संपत्ति को लेकर की गई जांच में जिस राजस्व निरीक्षक ललित नारायण प्रशांत ने जो साक्ष्य उपलब्ध कराए हैं, वे अपूर्ण और तथ्यहीन हैं। उन्होंने दावे के साथ आरोप लगाया है कि राजस्व निरीक्षक ललित कुमार बसपा के समर्थक हैं और उन पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप हैं। आरोप लगाया गया है कि ललित कुमार ने रिपोर्ट तैयार होने से पहले कई प्लाट धारकों को बचाने के नाम पर मोटी राशि मांगी थी पर कागजात सही होने के कारण लोगों ने उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसी के चलते उन्होंने जांच अधिकारी के सामने राजस्व से संबंधित सही तथ्यों को नहीं रखा है।

प्रशासन कर रहा गुमराह
प्रशासन द्वारा जॉन्स मिल क्षेत्र की जमीन को लेकर लगातार शासन और लोगों को गुमराह किया जा रहा है। जॉन्स मिल की जमीन को जबरन नजूल और सरकार की बताया जा रहा है, जबकि इसके संबंध में समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट, हाइकोर्ट से लेकर स्थानीय न्यायालयों के आदेश हुए हैं तथा इस बारे में कई बार निवर्तमान जिलाधिकारियों द्वारा जांच कराई जा चुकी हैं। जिस जमीन को वर्तमान प्रशासन नजूल व सरकारी बता रहा है, उस पर आज से नहीं बल्कि वर्षों से गोदाम, फैक्ट्री और फ्लैट बने हुए हैं। सभी काबिजों ने सरकारी अभिलेखों पर विश्वास कर विधिवत बैनामा करवाया है, यह जमीन नजूल नहीं है। इन लोगों द्वारा जलकर, गृहकर आदि लगातार दिया जा रहा है। अनेक भवनों का एडीए से नक्शा पास हुआ है। षडयंत्र के तहत स्थानीय वैध लोगों को अवैध घोषित कर हजारों निवासियों व व्यवसायियों को इस प्रकार से बदनाम कर रहा जैसे हमारी कौम जरायम पेशा हो। जबकि राजस्व अभिलेखों में दर्ज स्वामित्व और नजूल की एनओसी लेकर ही बैनामे कराए गये हैं।

अपना दर्द भी सीएम को लिखा
संघर्ष समिति के सदस्यों ने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में अपने दर्द को भी साझा किया है। उन्होंने लिखा है कि इस मामले में उन्होंने स्थानीय भाजपा के नेताओं, विधायकों, मेयर, सांसद सभी के दरवाजे खटखटाए पर वे सभी चुप्पी साधे हुए हैं। जब उनसे बात की जाती है तो वह सारे कागजात देखने के बाद कहते हैं कि वे अपनी जगह सही हैं और न्यायालय की शरण में जाएं। जिला प्रशासन की गलत कार्रवाई का विरोध करने की उनमें हिम्मत नहीं है, वे कहते हैं कि जमीनों के मामलों वे नहीं बोल सकते। इससे बेहतर तो ये सभी विधायक विपक्ष में ज्यादा ताकतवर और तेजतर्रार प्रतीत होते थे। इन्होंने कई बार प्रशासन को गलत मुद्दों पर झुकने को मजबूर किया था पर आज वे चुप हैं। वे जिला प्रशासन से नहीं तो शासन में हमारी बात को रख सकते हैं। समिति का कहना है कि वे वैश्य, पंडित, ठाकुर, सिंधी, पंजाबी हैं, जो संघ व भाजपा के स्वयंसेवक होने के साथ ही मतदाता भी हैं। प्रशासन द्वारा लगातार उनका मानसिक उत्पीड़न किया जा रहा है पर भाजपा के सारे जनप्रतिनिधि मौन साधे बैठे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से न्याय दिलाने की गुहार लगाई है।

जॉन्स मिल बस्ती छोड़ने पर सवाल
सीएम को भेजे पत्र में लिखा गया है कि इस जमीन के सामने एक बड़ी बस्ती है, जो जॉन्स मिल की परिधि में आती है। इस जमीन पर दलितों और मुसलमानों का वर्षों से अनाधिकृत कब्जा है। राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन नजूल और सरकार की है।

प्रशासन ने इस ओर जानबूझकर ध्यान नहीं दिया है। ये लोग सपा और बसपा के समर्थक हैं। यदि इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई होती है तो सरकार को बहुत बड़ी मात्रा में जमीन प्राप्त हो सकती है। ऐसा न करने से प्रशासन की मंशा साफ प्रदर्शित हो रही है कि वह केवल षडयंत्र कर भाजपा और संघ के समर्थकों को बदनीयती से बदनाम करने का प्रयास कर रहा है। यदि प्रशासन निष्पक्ष है तो जॉन्स मिल बस्ती के उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करे, जिनके नाम किसी भी सरकारी अभिलेखों न तो नाम है, न ही बैनामा करवाया है। वे पूर्णत: अवैध रूप से जमीन पर कब्जा किए हुए वर्षों से सरकारी जमीन पर बैठे हैं।

प्रशासन यह भी जानता है कि जॉन्स मिल लाइन के गरीब नगर, पटेल नगर आदि क्षेत्र की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे धारकों के खिलाफ कार्रवाई करने से उन्हें आर्थिक लाभ नहीं हो सकता है। यदि प्रशासन की नीयत साफ है तो जॉन्स मिल की पूरी जमीन की राजस्व रिकॉर्ड और न्यायालयों के आदेशों का सम्मान करते हुए विधिवत जांच कराए। इसमें हम लोगों का पक्ष सुना जाए। इसके बाद जो भी स्थिति निकलकर आए, तब कार्रवाई करे।

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