March 3, 2021
आगरा कारोबार क्राइम सरकार

मामला हाईकोर्ट पहुंचने से प्रशासन की गति धीमी पड़ी

  • जॉन्स मिल संपत्ति विवाद
  • जिलाधिकारी से जवाब-तलब किए जाने के बाद अब सबकी निगाहें प्रशासन के हलफनामे और हाईकोर्ट के आदेश पर टिकीं

जॉन्स मिल संपत्तियों को लेकर शताब्दी एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहे जिला प्रशासन की गति अब धीमी पड़ गई है। 15 दिसंबर को जांच रिपोर्ट आते ही जिलाधिकारी के तेवरों से जॉन्स मिल के बाशिंदों में खलबली मच गई थी। आए दिन इन लोगों को भूमाफिया घोषित करने और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मौखिक आदेश दिए जा रहे थे। नगर निगम, पुलिस, सिंचाई विभाग और नजूल विभाग को अपनी जमीन पर कब्जा लेने के लिए कहा जा रहा था। ताबड़तोड़ कार्रवाई और आदेशों से भय का माहौल बन चुका था पर अब इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती मिलने से कुछ हद तक ब्रेक लग गया है। अब हाईकोर्ट में जिलाधिकारी को जवाब देना है कि आखिर उन्होंने किस अधिकार से जॉन्स मिल के लोगों को बिजली, पानी के नये कनेक्शन देने, रजिस्ट्री और मानचित्र स्वीकृति पर प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए थे। इसके लिए जिलाधिकारी को अलग-अलग तिथियों पर हलफनामे दाखिल करने हैं। पहला हलफनामा 22 फरवरी तक तो दूसरा तीन हफ्ते के अंदर दाखिल करना होगा।

ताजा मामला नौ फरवरी को हाईकोर्ट में दो जजों की खंडपीठ द्वारा सुना गया। न्यायमूर्ति मनोज मिश्र और न्यायमूर्ति रविनाथ तिलहरी की बेंच के सामने गोविंद हाउसिंग की याचिका पर सुनवाई हुई। याची के अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में जिरह करते हुए बताया कि गोविंद हाउसिंग की जमीन के मामले में वर्ष 2014 में हाईकोर्ट के निर्देश पर ही जीवनी मंडी स्थित बंगला नंबर 13, जिसे बीमा अस्पताल के नाम से जाना जाता है, की जांच तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट द्वितीय रामजी लाल द्वारा की गई थी। हाईकोर्ट से जांच के आदेश पूर्व पार्षद सलीम उस्मानी की याचिका पर हुए थे। जांच रिपोर्ट में जांच अधिकारी रामजी लाल ने स्पष्ट लिखा था कि शिकायतकर्ता सलीम उस्मानी द्वारा झूठी शिकायत की गई है। गोविंदा हाउसिंग, अंकुर अग्रवाल, अशोक अग्रवाल द्वारा विधिवत बैनामा कराए गये हैं। बैनामाशुदा भूमि पर आगरा विकास प्राधिकरण से नियमानुसार मानचित्र स्वीकृत कराकर निर्माण कार्य कराया जा रहा है। जांच अधिकारी ने रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि राजस्व अभिलेखों में यह भूमि नॉन जेडए की है। काफी लंबे समय से राजस्व अभिलेखों में आबादी दर्ज है। प्रकरण पूर्णत: सिविल प्रकृति का है। शिकायतकर्ता को किसी भी दस्तावेज से समस्या है तो सिविल न्यायालय की शरण में जाना चाहिए। यदि शिकायतकर्ता विक्रय पत्र गलत बताता है तो उसे सक्षम न्यायालय में चाराजोई करनी चाहिए। इस स्तर पर विक्रय पत्र निरस्त करना संभव नहीं है। इसी जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन जिलाधिकारी की ओर से हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल किया गया था। इसके बाद इस मामले में कोई भी पक्ष सामने नहीं आया।

जॉन्स मिल संपत्ति विवाद के दरम्यान जिलाधिकारी प्रभु नारायण सिंह द्वारा लगाई गई रोक को इसी आधार पर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने जिरह के दौरान सवाल किया कि आखिर जिलाधिकारी ने किस आधार पर रोक लगाई है तो सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने सुनीता सिंह द्वारा दर्ज कराई एफआईआर को हवाला दिया। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने पूछा कि प्रशासन ने किस कानून के तहत रजिस्ट्री हस्तांतरण, निर्माण, बिजली के कनेक्शन पर रोक लगाई है। क्या इन सम्पत्तियों पर रोक यूपी के प्रावधानों के किसी भी कानून के तहत आती है।

मुसीबत न बन जाए जांच रिपोर्ट
गौरतलब है कि जॉन्स मिल क्षेत्र में एक विस्फोट के बाद जिलाधिकारी ने जुलाई में संपत्ति की जांच के आदेश देते हुए अपर जिलाधिकारी प्रशासन निधि श्रीवास्तव की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। इस रिपोर्ट में 1949 के गजट के आधार न्यायालयों के विभिन्न आदेशों को दरकिनार करते हुए पूरी जमीन को सरकारी बता दिया गया है। जॉन्स मिल संघर्ष समिति द्वारा अनेकों आरटीआई में प्रशासन से 277 पेज की जांच रिपोर्ट मांगी गई थी। प्रशासन इस रिपोर्ट को नहीं देने के लिए अनेक बहाने लगा रहा था। अब हाईकोर्ट के आदेश पर प्रशासन को पुरानी रिपोर्ट भी हाईकोर्ट में दाखिल करनी पड़ेगी।

टॉस्क फोर्स की बैठक आज
जिला स्तरीय एंटी भूमाफिया टॉस्क फोर्स की आज शाम जिलाधिकारी कैम्प कार्यालय पर बैठक होने जा रही है। बैठक में जॉन्स मिल संपत्ति के मामले में निर्णय लिया जा सकता है। इस मामले में प्रशासन द्वारा चिन्हित 60 उन लोगों पर फैसला लिया जाएगा, जिनको जांच रिपोर्ट में सरकारी संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने का दोषी माना गया है।

संपत्ति शीर्षक पर विवाद नहीं
खंडपीठ के आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि डीएम द्वारा जो आदेश दिए गए हैं, उसमें सम्पत्ति के हस्तांतरण को तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक कि अदालत द्वारा दी गई कुर्की या निषेधाज्ञा का आदेश नहीं होता। सम्पत्ति के शीर्षक के सम्बंध में कोई विवाद नहीं है। इसलिए जिला प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई पूरी तरह अधिकार क्षेत्र के बिना है। प्रशासन की जांच रिपोर्ट के खिलाफ जॉन्स मिल संघर्ष समिति के बाद गोविन्दा हाउसिंग ने भी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। पहली याचिका पर दो फरवरी व दूसरी याचिका पर नौ फरवरी को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।

जांच रिपोर्ट तलब
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने बताया कि जॉन्स मिल संपत्ति के मामले में तीन सदस्यीय कमेटी द्वारा जांच की जा रही है। हाईकोर्ट में जुलाई के जिलाधिकारी के आदेश पर बनी जांच कमेटी की रिपोर्ट की भी चर्चा हुई। इस पर हाईकोर्ट ने दोनों जांच रिपोर्ट सहित तीन सप्ताह के अंदर जिलाधिकारी को हलफनामा दाखिल करने के आदेश दिए और कहा कि जिलाधिकारी बताएं कि उन्होंने कानून के किस प्रावधान के तहत रोक के आदेश दिए हैं।

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