February 26, 2021
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विवि का कुलगीत आगरा के साहित्यकारों का अपमान

पदमश्री योगेंद्र बाबा राज्यपाल से करेंगे कुलपति की शिकायत

डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलगीत को लेकर आगरा के साहित्यकार रुष्ट हैं। इसका कारण आगरा के साहित्यकारों की अनदेखी है। संस्कार भारती के संस्थापक अध्यक्ष पद्मश्री योगेंद्र बाबा भी आक्रोशित हैं, उनका कहना है आगरा के साहित्यकारों की उपेक्षा कर अलीगढ़ के किसी संगीतज्ञ से कुलगीत लिखवाना आगरा के साहित्यजगत का अपमान है। कुलगीत में ब्रज की संस्कृति के बजाय उर्दू के शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो सर्वथा अनुचित है। इस मामले में वह राज्यपाल को पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराएंगे।
साहित्यकारों का कहना है कि कुलगीत को लागू करने की प्रक्रिया में अनियमितताएं बरती गई हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय को एक समिति गठित कर आगरा परिक्षेत्र के सभी साहित्यकारों, संगीतज्ञों व कवियों से कुलगीत की कृति आमंत्रित करनी चाहिए थी। फिर उसके बाद सर्वसम्मति से कुलगीत के लागू करने का निर्णय लेना चाहिए था। कु छ साहित्यकारों का आरोप है कि विवि द्वारा लागू किया गया कुलगीत, कविता व गीत के मापदंडों का पालन नहीं करता है। कुलगीत में उर्दू के शब्दों के प्रयोग से भी साहित्यकार आहत हैं। साहित्यकारों का कहना है कि आगरा ब्रज क्षेत्र में आता है तो गीत में ब्रज भाषा की झलक होनी चाहिए थी। बता दें कि विवि में 20 जनवरी को आयोजित हुई कार्य परिषद की बैठक में कुलगीत को एप्रूवल करा लिया गया।

पद्मश्री योगेन्द्र बाबा, संस्थापक संस्कार भारती

आगरा की एक महिमा है, आगरा के अपने शब्द हैं। आगरा ब्रजभूमि के अंतर्गत आता है। आगरा में साहित्य के बहुत बड़े पुरोधा हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय द्वारा किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा रचित गीत को विश्वविद्यालय के कुल गीत के रूप में मान्यता देना निंदनीय है। विश्वविद्यालय के कुल गीत में उर्दू के कई शब्दों का प्रयोग किया गया है जोकि उचित नहीं है। कुलगीत में ब्रजभाषा को स्थान दिया जाना चाहिए था। कुलपति को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। मैं कुलाधिपति एवं अन्य संबंधित से कुल गीत में बरती गई अनियमितताओं व स्थानीय साहित्यकारों की अनदेखी को लेकर बात करूँगा।

सोम ठाकुर, विख्यात कवि

मैंने बहुत समय पहले विश्वविद्यालय के लिए कुलगीत लिखा था परंतु किसी कारणवश वह लागू नहीं हो पाया। मैं कुलगीत लिखने मैं सक्षम हूँ। अगर मुझे मौका दिया जाता तो मैं लिख सकता था। विश्वविद्यालय का अपना कुलगीत बना है यह अच्छी बात है लेकिन आगरा के साहित्यकारों या अन्य साहित्य के विद्वानों को कुलगीत से दूर रखना कहीं न कहीं उनका अपमान है। सभी साहित्यकारों से चर्चा व एक निहित प्रक्रिया के तहत कुलगीत को लागू किया जाना चाहिए था। बाहरी व्यक्ति द्वारा कुलगीत लिखवाना स्थानीय साहित्यकारों की अनदेखी है।

डॉ. राजकुमार रंजन, वरिष्ठ साहित्यकार

आगरा साहित्य की राजधानी है। अगर विश्वविद्यालय को कुलगीत लिखवाना था तो उन्हें आगरा के वरिष्ठ साहित्यकारों को आमंत्रित करना चाहिए था। एक समिति बनाकर सभी से राय लेकर निर्णय लेना चाहिए था। इस प्रकार किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा कुलगीत लिखवाना मनमानी है। यह आगरा के वरिष्ठ साहित्यकारों का अपमान है। आगरा में साहित्य के मूर्धन्य लोगों की उपस्थिति के वाबजूद किसी बाहरी को आयतित करने की विवि को क्या आवश्यकता थी? आगरा के सभी साहित्यकार इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। मेरी तमाम लोगों से बात हुई है जोकि विश्वविद्यालय के इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं। मैं राज्यपाल को विश्वविद्यालय के इस फैसले के विरोध में पत्र लिखूंगा।

शीलेन्द्र कुमार वशिष्ठ, वरिष्ठ साहित्यकार

आगरा के साहित्यकारों की अनदेखी कर किसी बाहरी से विश्वविद्यालय का कुलगीत लिखे जाने की खबर से हार्दिक वेदना हुई है। आगरा शुरू से ही साहित्य-साधकों की भूमि रही है। महात्मा सूरदास, नजीर अकबराबादी, सत्य नारायण ‘कविरत्न’, हृषिकेश चतुवेर्दी, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, प्रताप दीक्षित से लेकर वर्तमान में भी अनेक मंचीय और साहित्यिक कवि आगरा में हैं। जिन्होंने अपनी काव्य-साधना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव प्राप्त किया है। जो कुलगीत मान्य किया गया है वह कविता और गीत के मापदंड़ों पर खरा नहीं उतरता।

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