February 26, 2021
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इस हफ्ते किसानों को फिर न्योता देगा केंद्र?

  • किसान आंदोलन निर्णायक मोड़ पर
  • नये फॉर्मूले पर सरकार कर रही विचार-विमर्श
  • किसान नेता भी वार्ता को लेकर हैं सकारात्मक

कल से शुरू होने वाला हफ्ता किसान आंदोलन में निर्णायक साबित हो सकता है। सरकार बातचीत का नया फॉर्मूला किसानों को दे सकती है और इसका दायरा भी बढ़ा सकती है। सरकार किसान संगठनों को ‘खुलकर’ बातचीत करने का नया प्रस्ताव जल्द देगी। इसमें सरकार किसानों से ही प्रस्ताव मांगेगी और उस पर विस्तार से उनके सामने बात रखेगी। अगले हफ्ते के अंत तक बातचीत का सिलसिला फिर शुरू हो सकता है। किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि वर्तमान दबाव की स्थिति में बातचीत संभव नहीं है लेकिन किसान नेताओं में वार्ता के प्रति सकारात्मक रुख है। ऐसे में लगता है कि यह सप्ताह काफी निर्णायक हो सकता है।

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस के बाद सरकार की ओर से बात रखेंगे। इसमें वह कानून और टकराव के बीच के रास्ते की बात करेंगे। पिछले दिनों पीएम मोदी ने यह कहकर किसान और सरकार के बीच बातचीत का चैनल खोल दिया था कि कृषि मंत्री किसानों से महज एक फोन की दूरी पर हैं और कानून को डेढ़ साल रद्द करने का सरकार का प्रस्ताव अभी भी कायम है। इसके बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने हालात का जायजा लिया था। पीएम मोदी ने संकेत दिया था कि सरकार किसानों से अभी भी बातचीत के लिए तैयार है।

दरअसल, 22 जनवरी को वार्ता विफल होने के बाद से लेकर अब तक सरकार और किसानों के बीच कोई बात नहीं हुई है। सरकार ने दो जनवरी को यह भी कह दिया कि कानून को डेढ़ साल तक स्थगित करने के प्रस्ताव के बाद अब इससे आगे कुछ नहीं देंगे तो किसान संगठनों ने भी दो टूक कहा था कि कानून वापसी से कम की शर्त मंजूर नहीं। इसके बाद से ही बातचीत किस तरह शुरू हो, इसे लेकर उलझन की स्थिति बनी हुई है। सरकार को पता है कि अब बातचीत का रास्ता अधिक दिनों तक बंद नहीं रखा जा सकता है। संवादहीनता की स्थिति में टकराव बढ़ने का डर है। वहीं, इसके देश के दूसरे हिस्सों तक भी पसरने की आशंका है। विपक्ष अब खुलकर किसान आंदोलन को समर्थन दे रहा है। इस कारण पिछले कुछ दिनों में पंजाब और हरियाणा से बाहर राजस्थान तक आंदोलन बढ़ा। दूसरी ओर, किसान संगठनों के बीच भी बातचीत शुरू करने का दबाव है। हालांकि, 26 जनवरी को हुई हिंसक आंदोलन के बाद एक बार आंदोलन जरूर कमजोर होता दिखा लेकिन बाद में फिर संभला।

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