February 28, 2021
आगरा इतिहास क्राइम सरकार

डीएम बताएं-किस कानूनी अधिकार से बिजली और पानी पर रोक लगाई

  • जॉन्स मिल संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट ने किया जवाब-तलब
  • हाईकोर्ट में प्रशासनिक अधिकारियों को नाम के साथ पार्टी बनाने की तैयारी
  • 198 आवेदनों का राजस्व रिकॉर्ड से मिलान हुआ शुरू, आठ दिन में रिपोर्ट

जॉन्स मिल संपत्ति विवाद में एडीएम प्रशासन निधि श्रीवास्तव की जांच रिपोर्ट आने के बाद आनन-फानन में जिलाधिकारी द्वारा किए गये आदेशों को अब उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जिलाधिकारी के 29 जुलाई और 22 दिसंबर 2020 के आदेशों पर जबाव-तलब कर लिया है। हालांकि जिलाधिकारी का कहना है कि उन्हें अभी हाईकोर्ट का आदेश मिला नहीं है। आदेश मिलने के बाद विधिक राय लेकर हाईकोर्ट में जवाब दाखिल किया जाएगा।

गौरतलब है कि जॉन्स मिल मामले में जांच रिपोर्ट को लेकर तमाम सवाल उठने लगे हैं। जॉन्स मिल संघर्ष समिति के सदस्य लगातार कह रहे हैं कि जांच रिपोर्ट तैयार करने से पहले उनका पक्ष सुना ही नहीं गया है। वे मानते हैं कि जांच रिपोर्ट में सभी तथ्यों और राजस्व अभिलेखों का सही परीक्षण नहीं किया गया है। जांच समिति ने संपत्ति को लेकर पूर्व में हुए न्यायालयों के आदेशों का भी परीक्षण नहीं किया है। सदस्यों का यह भी कहना है कि जांच रिपोर्ट तैयार होने से पहले एडीएम प्रशासन ने उनसे कागजात मांगे थे, जो उन्होंने सौैंप दिए थे। इन कागजातों का भी सही से परीक्षण नहीं किया गया। बाद में जांच रिपोर्ट में उन्हें ही दोषी बनाकर उनके खिलाफ कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई।

संघर्ष समिति के सदस्य इसी बात को लेकर अपने को असहज महसूस कर रहे थे। इसको लेकर उन्होंने पक्ष और विपक्ष के बड़े नेताओं और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे पर भी दस्तक दी पर कहीं से भी उन्हें राहत नहीं मिल सकी। इसके बाद ही जिलाधिकारी के आदेशों से प्रभावित लोगों ने न्यायालय का रुख किया। जॉन्स मिल क्षेत्र निवासी मनोज कुमार जैन सहित 46 लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर जिलाधिकारी के 29 जुलाई  व 22 दिसम्बर 2020 के आदेशों को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने तीन फरवरी 2021 को सुनवाई करने के बाद  जिलाधिकारी से जवाब तलब किया है कि उन्होंने किस कानूनी अधिकार के तहत ये आदेश जारी किए हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि जिलाधिकारी ने 29 जुलाई 2020 को आदेश जारी कर जॉन्स मिल की समस्त संपत्तियों के बैनामों पर रोक लगा दी थी। इसके बाद कई लोगों ने निबंधन कार्यालय जाकर बैनामे कराने का प्रयास किया पर उन्हें निबंधन कार्यालय से बैरंग लौटा दिया गया था। जिलाधिकारी ने अपना दूसरा आदेश 22 दिसंबर 2020 को जारी किया। इस आदेश में उन्होंने बैनामों की रोक को जारी रखते हुए नये विद्युत और पानी के कनेक्शन तथा नये निर्माण व मरम्मत पर रोक लगा दी थी। साथ ही जिलाधिकारी ने रजिस्ट्री के हस्तांतरण पर भी रोक लगा दी थी। इन दोनों ही आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट द्वारा जारी आदेश में जिलाधिकारी से पूछा गया है कि किस अधिकार के तहत उन्होंने यह आदेश पारित किए हैं। प्रशासन की ओर से पेश सरकारी अधिवक्ता हाईकोर्ट के इस सवाल का जवाब नहीं दे सके। हाईकोर्ट ने जिलाधिकारी को 22 फरवरी को इस संबंध में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।

जांच अधिकारियों को बनाया जाएगा पार्टी
संघर्ष समिति के सदस्यों का कहना है कि जांच रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाजिमी है। क्योंकि इसमें तथ्यों का बिना परीक्षण किए उन लोगों को दोषी साबित करने का प्रयास किया गया है। समिति के सदस्य अब कुछ रिटों में जांच करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को उनके नाम से ही वादी बनाने की तैयारी कर रहे हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से आने वाले समय में क्षेत्रीय लोगों का बार-बार शोषण न हो सके।

आवेदनों का परीक्षण शुरू
इधर जिलाधिकारी के निर्देश पर इस मामले में जांच कर रहे दूसरे जांच अधिकारी एडीएम आतिथ्य पुष्पराज सिंह के पास जॉन्स मिल के लोगों के 198 आवेदन आए हैं। इन लोगों ने अपने बैनामे, खसरा-खतौनी और न्यायालयों के आदेशों के साथ ही शपथपत्र भी प्रस्तुत किया है। इन कागजातों का नजूल व राजस्व रिकॉर्ड से मिलान का काम प्रारंभ कर दिया गया है। आठ दिन में इसकी रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंप दी जाएगी। इसके बाद ही जिलाधिकारी सिंचाई, नगर निगम, पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त समिति गठित कर सरकारी जमीन पर कब्जे लेने की प्रक्रिया प्रारंभ कराएंगे। इस मामले में सरकारी संपत्ति क्षति करने के मामले सामने आने पर विधिक कार्रवाई के लिए राजस्व परिषद को भी प्रस्ताव भेजा जाएगा।

दर्जनों रिट लगाने की तैयारी
जॉन्स मिल निवासियों व व्यापारियों की तरफ से अनेक रिट हाईकोर्ट में दाखिल करने की तैयारी हो चुकी है। जल्दी ही दो दर्जन से अधिक रिट हाईकोर्ट में दाखिल की जाएंगी। जॉन्स मिल संघर्ष समिति के सदस्यों का कहना है कि प्रशासन द्वारा पूर्व में भी अनेक बार जांच हो चुकी है। ज्यादातर मामले में लोगों को क्लीन चिट मिली है। इतना ही नहीं आरटीआई में मांगे गये जवाब में भी राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन नजूल की नहीं बताई गई है। इसके बावजूद पता नहीं, किस नीयत से प्रशासन उनको दोषी ठहराने पर तुला हुआ है। सदस्यों का कहना है कि प्रशासन की मंशा पर भी अब सवाल उठने लगे हैं।

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