April 13, 2021
आगरा इतिहास

इंकलाब जिंदाबाद!!

  • एक बरस साथियों सहित ताजनगरी में रहे थे भगत सिंह
  • यहीं तैयार किया था ब्रिटिश असेंबली में फेंका गया बम
  • कीठम, कैलाश, भरतपुर के जंगल में करते थे बम की टेस्टिंग
  • पहचान छिपाने को आगरा कॉलेज में ले लिया था एडमिशन

मेरी हवाओं में रहेगी, खयालों की बिजली, यह मुश्त-ए-खाक है फानी, रहे-रहे न रहे।

शहीद ए आजम भगत सिंह ने अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को तीन मार्च 1931 को लिखे एक पत्र में इन पंक्तियां का उल्लेख किया था। लाहौर जेल से लिखे इस पत्र की इन लाइनों को वे अपने आगरा प्रवास के दौरान कई बार गुनगुनाते थे। आगरा में रहे दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी और काला पानी के सजा काटने वाले ठाकुर राम सिंह भी भगत सिंह की इन पंक्तियों का कई बार उल्लेख करते थे।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का ताजनगरी से रिश्ता बहुत गहरा था। वे साल भर यहां रुके थे। नूरी दरवाजे की एक कोठी में किराए पर रहते थे। आगरा कॉलेज में दाखिला लिया और अंग्रेजी हुकूमत को हिलाने के लिए इसी घर में बम तैयार किए। इन एक वर्षों के दौरान वे हींग की मंडी और नाई की मंडी भी रहे। कीठम, कैलाश के साथ ही भरतपुर के जंगलों में ये क्रांतिकारी हथियारों से निशाना लगाने का अभ्यास भी करते थे।

आगरा में क्रांतिकारियों की गतिविधियां बहुत अधिक नहीं थीं, जिसके चलते यहां माहौल शांत था। यहां रहने से किसी को उन पर शक नहीं होता था। यही कारण था कि भगत सिंह व उनके साथियों को यह शहर मुफीद रहा। कैलाश, कीठम और भरतपुर के जंगलों का भी उन्हें फायदा मिलता था। सरदार भगत सिंह ने जिस कोठी में एक साल बिताया, आज वो जर्जर है। पेठे का गोदाम बन गई है।

पांच रुपये महीने किराए पर रहे थे
आगरा।
दरअसल नवंबर, 1928 में ब्रिटिश पुलिस आॅफिसर सांडर्स हत्याकांड के बाद भगत सिंह अज्ञातवास के लिए आगरा आए थे। भगत सिंह ने नूरी दरवाजा स्थित मकान नंबर 1784 को लाला छन्नो मल को ढाई रुपए एडवांस देकर पांच रुपए महीने पर किराए पर लिया था। यहां सभी छात्र बनकर रहे। तीनों क्रांतिकारियों के केस की सुनवाई के दौरान 28 व 29 जुलाई, 1930 को आगरा के दर्जन भर लोगों की भी गवाही हुई थी। सांडर्स मर्डर केस में गवाही के दौरान लाला छन्नो मल ने यह बात स्वीकारी थी कि उन्होंने भगत सिंह को किराए पर कमरा दिया था।

आठ अप्रैल, 1929 को अंग्रेजों ने सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल असेंबली में पेश किया था। ये बहुत ही दमनकारी कानून थे। इसके विरोध में भगत सिंह ने असेंबली में बम फोड़ा और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाए। इस काम में बटुकेश्वर दत्त भी भगत सिंह के साथ थे। घटना के बाद दोनों ने असेंबली में ही सरेंडर भी कर दिया था। इसी केस में 23 मार्च 1931 को लाहौर के सेंट्रल जेल में भगत सिंह को फांसी दे दी गई और बटुकेश्वर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

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