February 25, 2021
आगरा शिक्षा

कई चेयर व संस्थानों का हो चुका है पराभव

  • कितना एक्सीलेंट होगा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस?
  • नियमित शिक्षकों के अभाव में कैसा होगा स्वरूप

डा. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय द्वारा नवनिर्मित संस्कृति भवन को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने की योजना कितनी प्रभावी हो पाएगी, इसमें संदेह है। विवि में व्याप्त लाल फीताशाही में कई ऐसी ही पुरानी योजनाएं दम तोड़ने के कगार पर हैं। एडहॉक तथा अतिथि शिक्षकों के दम पर यह सेंटर कितना कामयाब हो पाएगा, यह भविष्य के गर्त में है।

दरअसल विश्वविद्यालय विभिन्न कुलपतियों की प्रयोगशाला बन कर रह गया है। हर नये कुलपति द्वारा नई योजना लायी जाती है जो कुलपति के जाते ही दम तोड़ देती है। विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति जिस अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से आए हैं, वहां स्थायी शिक्षकों की प्रत्येक विभाग में पर्याप्त संख्या है। सभी विश्वविद्यालयों को दिए जाने वाले बजट का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा एएमयू पर सरकार खर्च करती है। दूसरी ओर डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में किसी भी संस्थान के निदेशक को 1000 रुपये से अधिक व्यय करने का अधिकार नहीं है। 1000 रुपये का बिल पास कराने के लिए भी निदेशक को कई चक्कर विश्वविद्यालय के विभागों के लगाने पड़ते हैं। 1000 रुपये में किस तरह से कोई निदेशक संस्थान की मेनटीनेंस कर पाएगा, यह शोध का विषय है। हालांकि सेंटर आॅफ एक्सीलेंस की परिकल्पना बहुत व्यापक है। यदि नियमित शिक्षकों और विषय विशेषज्ञों के साथ पर्याप्त छात्र इस संस्थान को मिल सकें तो कला व संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का कार्य सहज हो सकेगा। यह बात दीगर है कि विश्वविद्यालय अपने प्रोफेसर्स में से एक अदद प्रोफेसर संस्थान के निदेशक के रूप में नहीं खोज सका है।

बता दें कि विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति केएन त्रिपाठी ने लाइफ लांग लर्निंग इंस्टीट्यूट का उद्घाटन किया। गणित विभाग के प्रो. संजीव शर्मा को इस इंस्टीट्यूट का निदेशक बनाया गया। दावा किया गया था कि इस इंस्टीट्यूट के माध्यम से किसी भी उम्र के व्यक्ति अपनी पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से कर सकेंगे। पूर्व कुलपति केएन त्रिपाठी गए तो यह संस्थान भी उनके साथ हवा हो गया।

इसी प्रकार विश्वविद्यालय में आंबेडकर चेयर, कांशीराम चेयर, चौधरी चरण सिंह चेयर तथा एड्यूसेट संचालित किया गया। यह सभी संस्थान जब बनाए गए तो इनके बारे में बड़े बड़े दावे किए गए कि ये संस्थान शिक्षा जगत में क्रांति ला देंगे। बड़े-बड़े शोध इन संस्थानों के माध्यम से किए जाएंगे, किंतु आज इन संस्थानों की स्थिति बदहाल है। इन संस्थानों को दिए गए बजट का क्या हुआ तथा कितने छात्रों ने यहां शोध कार्य किए, यह जानना भी नए कुलपति के लिए जरूरी है। ताकि जो गलतियां उन संस्थानों को खोलने के बाद हुई उसकी पुनरावृत्ति न हो।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *