February 28, 2021
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150 साल में किसी को नहीं हुई फांसी

उत्तर प्रदेश का अकेला महिला फांसीघर मथुरा में है। अंग्रेज हुकूमत ने इसे 1870 में बनवाया था। पिछले 150 साल से एक भी महिला कैदी को यहां फांसी नहीं मिली है। यह फांसीघर करीब 400 मीटर का है। बीच में फांसी का प्लेटफॉर्म और आसपास काफी खाली जमीन पड़ी हुई है। यहां क्यारियां भी हैं, जहां जेल प्रशासन द्वारा सब्जियां भी उगाई जाती हैं। डेट वारंट जारी होने के बाद कैदी को यहां से करीब 200 मीटर दूर तन्हाई बैरिक में रखा जाता है। करीब 23 साल पहले अप्रैल 1998 में रामश्री नाम की महिला कैदी को फांसी की सजा सुनाई गई थी लेकिन उसका बेटा छोटा होने के कारण उसकी फांसी पर रोक लगा दी गई थी।

अब तक चार फांसी दे चुके हैं पवन जल्लाद
शबनम को फांसी देने की तैयारियां जारी हैं। निर्भया के दोषियों को फंदे पर लटकाने वाले मेरठ के पवन जल्लाद को ही यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। हाल में ही पवन ने मथुरा जेल में फांसीघर का दौरा किया। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि फांसी देने का लीवर खराब है। पट्टा भी टूट चुका है। इसे बदलने की आवयकता है। पिछले साल 21 मई को सुबह चार बजे पवन जल्लाद ने ही दिल्ली की तिहाड़ जेल में निर्भया कांड के चार दोषियों को फांसी पर लटकाया था। पवन के नाम अब तक चार फांसी देने का रिकॉर्ड है। उनकी कई पीढ़ियां इस पुश्तैनी काम को करती रही हैं।

फांसी के रस्से पर लगेगा शहद और देशी घी
शबनम को फांसी देने के लिए बिहार की बक्सर जेल से रस्सा मंगवाया गया है। एक इंच मोटे व्यास के दो रस्सों की व्यवस्था की जा रही है। 24 फीट लंबे एक रस्से के कीमत 1643 रुपये है। शबनम के लिए दो फंदे तैयार किए जा रहे हैं, जिसकी कीमत 3246 रुपये है।


रस्सी को घड़े के अंदर सुरक्षित बंद रखा जाएगा। इस पर शहद और देशी घी का लेपन होगा। रस्सों में कीटाणु नहीं पनपें और चूहे न कुतर दें, इसके लिए उन पर कार्बोनिक एसिड भी लगाया जाएगा। मटकों को सील आदि से बचाने के लिए सुरक्षित स्थान पर रखा जाएगा। जेल प्रशासन शबनम की फांसी की तिथि घोषित होने से पूर्व अपनी सभी तैयारियां पूरी कर लेना चाहता है। फांसी की प्रक्रिया से पूर्व शाम को फांसी दिए जाने के तख्ते, लीवर आदि की जांच जेल अधीक्षक करेंगे। फांसी के तख्ते को गिरा कर देखा जाएगा। दो मन बालू से भरे बैग से फांसी की रिहर्सल होगी। इसके बाद रस्सी को जेलर द्वारा सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया जाएगा। जेल मैनुअल के अनुसार फंदे के निर्माण को यदि पांच वर्ष से अधिक का समय हो जाता है, तो उसे फांसी देने योग्य नहीं माना जाता। उसे नष्ट करा दिया जाता है और फांसी के लिए दूसरे नये रस्से की व्यवस्था करनी होती है। रस्से पर एक चिप्पी लगाई जाती है, जिस पर रस्से की तिथि दर्ज रहती है। मियाद समाप्त होने पर रस्से को जेल परिसर में ही नष्ट किया जाता है।

अपनी मां शबनम के लिए दया की गुहार लगाता बेटा ताज। इसका जन्म जेल में ही हुआ था।

कौन होगा शौकत की संपत्ति का हकदार
शबनम के पिता पर लाखों रुपये की संपत्ति थी। जिनमें एक बेशकीमती बाग व कोठी शामिल है। शबनम की मौत के बाद यह संपत्ति किसे मिलेगी, इस पर भी माथापच्ची चल रही है। शबनम का बेटा ताज नाबालिग है और वैध रूप से उसकी शादी सलीम के साथ नहीं हुई थी। जानकार बताते हैं कि शबनम अपने पिता शौकत अली एवं परिवार के सात सदस्यों की हत्या करने के बाद उनकी संपत्ति की वारिस नहीं हो सकती।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 की धारा 114 (ग) में स्पष्ट उल्लेख है कि कोई व्यक्ति जो किसी भूमिधर या आसामी की हत्या कर देता है या ऐसी हत्या किए जाने के लिए दुष्प्रेरित करता है, वो किसी जोत में मृतक के हित को उत्तराधिकार में प्राप्त करने के लिए अयोग्य हो जाता है। उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता धारा 114 ( घ) में वर्णित है कि यदि कोई व्यक्ति खंड (ग) के अधीन किसी भूमिधर या आसामी के जोत में हित को उत्तराधिकार में प्राप्त करने के लिए अयोग्य हो जाए, तो ऐसे हित का इस प्रकार न्यागमन हो जाएगा। ऐसी दशा में शबनम को फांसी दिए जाने के उपरांत उसका पुत्र ताज मृतक शौकत अली की संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता। फिर भी अंतिम फैसला कोर्ट का होगा। बुलंदशहर के सुशीला विहार कॉलोनी में रहने वाले उस्मान सैफी को शबनम के बेटे ताज की जिम्मेदारी सौंपी गई है। शबनम के बेटे का जन्म जेल में ही हुआ था। छह बरस का होने पर उसे जेल से बाहर लाया गया था।

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