February 25, 2021
आगरा ताजा नगर निगम सरकार

चार करोड़ और बहाने की तैयारी

  • पहले खरीदे डस्टबिन खत्म भी नहीं कि 84 हजार का सेट और खरीदने का ताना-बाना
  • बगैर किसी कार्ययोजना के करोड़ों के डस्टबिन खरीदे और बांटे पर उपयोग में नहीं आ रहे
  • महानगर में गीला-सूखा और संक्रमित कूड़ा पहले की तरह एकसाथ एकत्रित किया जा रहा

करोड़ों रुपये कीमत अदा कर खरीदे गए डस्टबिन नगर निगम अभी पूरी तरह बांट भी नहीं पाया है कि 84 हजार डस्टबिन सेट और खरीदने की तैयारी नगर निगम के अधिकारी कर रहे हैं। अगर ये ख्ररीदे जाते हैं तो नगर निगम इस पर चार करोड़ रुपये व्यय करेगा। सवाल यह उठ रहे हैं कि पहले ही वितरित किए जा चुके डस्टबिनों को लोगों ने नहीं अपनाया है तो फिर इस पर पैसा क्यों बर्बाद किया जा रहा है।

नगर निगम में भाजपा के पार्षद रवि बिहारी माथुर भी इस मामले में एक प्रस्ताव लगाकर निगम अधिकारियों से जवाब तलब कर चुके हैं। बकौल माथुर, अधिकारियों ने बगैर किसी कार्ययोजना और बगैर किसी औचित्य के बड़ी मात्रा में डस्टबिन की खरीद की। लाल-हरे और नीले रंग के प्लास्टिक के ये डस्टबिन खरीदने की वजह यह बताई गई कि हर घर को ये उपलब्ध कराकर लोगों से कहा जाएगा कि गीला-सूखा और संक्रमित कूड़ा अलग-अलग डस्टबिनों में डालें। नगर निगम के कर्मचारी इन डस्टबिनों से कूड़ा अलग-अलग एकत्रित करेंगे ताकि खत्ताघर पर कूड़े का प्रभारी ढंग से निस्तारण किया जा सके। नगर निगम ने सबसे पहले उन गृहस्वामियों को ये डस्टबिन मुफ्त उपलब्ध कराए, जो समय पर गृहकर अदा कर रहे हैं। डस्टबिन बहुत थे, इसलिए बाद में सभी गृहस्वामियों को आधार कार्ड के आधार पर डस्टबिन प्रदान किए गए। इसके बाद भी स्टॉक में भारी मात्रा में डस्टबिन बचे दिखे तो फिर इन्हें दुकानदारों को उपलब्ध कराया गया। दुकानों पर जब ये डस्टबिन दिए जा रहे थे, तब भी सवाल उठ रहे थे कि लाल रंग का डस्टबिन इन्हें क्यों दिया जा रहा है क्योंकि ये तो संक्रमित कूड़े के लिए है।

पहले खरीदे गए डस्टबिन बांटने में नगर निगम को इतनी तिकड़में भिड़ानी पड़ीं तो अब इन्हीं डस्टबिन के 84 हजार फिर से खरीदने की तैयारी क्यों हो रही है? वह भी तब जबकि अब तक बांटे जा चुके डस्टबिन लोग उपयोग में ही नहीं ला रहे। जो लोग इस्तेमाल कर भी रहे हैं, वे गीला-सूखा और संक्रमित कूड़ा अलग-अलग रंग के डस्टबिन में एकत्रित न कर एक ही डस्टबिन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे गीले और सूखे कूड़े को अलग-अलग कलेक्ट करने का उद्देश्य ही फेल हो गया है।

सही बात तो ये है कि नगर निगम ने बगैर किसी तैयारी के तीन रंग के डस्टबिन खरीदे और घरों में बांटने शुरू कर दिए। अच्छा तो ये होता कि पहले प्रचार-प्रसार कर लोगों को बताया जाता कि उन्हें तीन रंग के जो डस्टबिन दिए जा रहे हैं, उनमें किस तरह कूड़ा एकत्रित करना है। घरों में तो लापरवाही हुई ही, नगर निगम के स्तर से भी गीले-सूखे और संक्रमित कूड़े को उठाने के लिए अपेक्षित इंतजाम नहीं किए गए, जिसकी वजह से स्वच्छ भारत मिशन में गीले-सूखे और संक्रमित कूड़े को अलग-अलग जगह डम्प कर उसके निस्तारण की मंशा पर ही पानी फिर गया।

कूड़ा कलेक्शन की व्यवस्था थी नहीं, डस्टबिन बांटते जा रहे थे
नगर निगम द्वारा जिस वक्त गीले-सूखे और संक्रमित कूड़े के लिए हरे-नीले और लाल रंग के प्लास्टिक डस्टबिन बांटे जा रहे थे, उस समय शहर में डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन का काम भी नहीं हो रहा था। इस काम के लिए जिन चार कंपनियों से करार किया गया था, वे घपला कर रही थीं। इसके उजागर होने पर वे रातोंरात यहां से भाग खड़ी हुई थीं। सवाल यह उठता है कि जब डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन की व्यवस्था ही नहीं थी तो डस्टबिन क्यों बांटे गए। क्या तब तक इंतजार नहीं किया जाना चाहिए था जब तक कि डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन के लिए नई कंपनियों से करार नहीं हो जाता।

नगर निगम के जिन अधिकारियों ने बगैर किसी कार्ययोजना के भारी मात्रा में प्लास्टिक के डस्टबिन खरीदे, उनके खिलाफ जांच कराई जाए। दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।

रवि बिहारी माथुर, पार्षद

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