March 6, 2021
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आरटीआई पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, कोर्टस को नोटिस

12 अक्टूबर 2005 को देश में सूचना अधिकार अधिनियम लागू हुआ था, जिसकी धारा 6(1) के अनुसार इलैक्ट्रोनिक माध्यम से सूचना आवेदन पत्र लगाये जाने की व्यवस्था थी, लेकिन 15 वर्ष से अधिक समय व्यतीत होने पर भी देश के उच्च न्यायालयों ने ऑनलाइन आरटीआई पोर्टल नहीं बनाया है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर की थी। इस पर सुनवाई के बाद देश के 25 उच्च न्यायालयों व केन्द्र सरकार को तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने 13 जनवरी 2021 को नोटिस जारी किया है।

अधिवक्ता जैन द्वारा बताया गया कि उच्च न्यायालयों एवं उनके अधीनस्थ जिला न्यायालयों से जब सूचना अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत सूचना लेनी होती है तो पोस्टल ऑर्डर या ड्राफ्ट लगाकर आवेदन पत्र डाक द्वारा भेजना होता है और इस प्रक्रिया में सूचना प्राप्त करने वाले आवेदक को कठिनाई का सामना करना होता है।  इस प्रक्रिया के कारण सूचना मिलने में भी देरी होती है। अनेक बार आवेदक को यह मालूम नहीं होता है कि उसे किस नाम से पोस्टल ऑर्डर या ड्राफ्ट भेजना है। इन सब परेशानियों को दूर करने की दृष्टि से सभी उच्च न्यायालयों को तथा उनके अन्तर्गत आने वाले जिला न्यायालयों को अपना आरटीआई पोर्टल बनाना चाहिए, जिसके माध्यम से न केवल आवेदन पत्र भी भेजा जा सकता है बल्कि सूचना न देने या अधूरी देने पर अपील भी की जा सकती है। आवेदन शुल्क भी ऑनलाइन क्रेडिट या डेबिट कार्ड के माध्यम से किया जा सकता है। आरटीआई पोर्टल बनने से सूचनाएं भी ऑनलाइन जल्दी प्राप्त हो सकती हैं। सूचना अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद-19 के अन्तर्गत वाक्य एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद-32 में याचिका दायर की जा सकती है।   

इसी पृष्ठभूमि को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका वर्ष 2020 में अधिवक्ता जैन द्वारा स्वयं दायर की गई थी, जिसको न्यायमूर्ति एन नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति इन्दु मेहरोत्रा एवं न्यायमूर्ति विनित सरन की खण्डपीठ ने देश के सभी उच्च न्यायालयों को एवं केन्द्र सरकार को नोटिस जारी करने का आदेश दिये हैं।

याचिका में केन्द्र सरकार द्वारा इस कार्य के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग दिये जाने की मांग की गई है। अधिवक्ता जैन द्वारा यह आशा प्रकट की गई कि इस जनहित याचिका के स्वीकार होने की स्थिति में सूचना अधिकार और अधिक प्रभावी हो सकेगा और बिना कठिनाइयों के सूचनाओं को प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

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